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महत्वपूर्ण जानकारी सोयाबीन की खेती बुवाई से लेकर कटाई तक कैसे करें,

महत्वपूर्ण जानकारी सोयाबीन की खेती बुवाई से लेकर कटाई तक कैसे करें,

सोयाबीन खरीफ मौसम की एक प्रमुख फसल है। यह दलहन के बजाय तिलहन की फसल मानी जाती है। क्यूकि तेल के रूप से इसका आर्थिक उद्देश्य सबसे ज्यादा है | सोयाबीन मानव पोषण एवं स्वास्थ्य के लिए एक बहुउपयोगी खाद्य पदार्थ है।
सोयाबीन एक महत्वपूर्ण खाद्य स्रोत है। इसके मुख्य घटक प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और वसा होते है। सोयाबीन में 44 प्रतिशत प्रोटीन, 22 प्रतिशत वसा, 21 प्रतिशत कार्बोहाइडेंट, 12 प्रतिशत नमी तथा 5 प्रतिशत भस्म होती है।

सोयाबीन से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण लेखों का विशेष संग्रह जो आपको सोयाबीन की खेती के बारे में सब कुछ जानने में मदद करेगा।
सोयाबीन की खेती अधिक हल्‍की रेतीली व हल्‍की भूमि को छोड्कर सभी प्रकार की भूमि में सफलतापूर्वक की जा सकती है परन्‍तु पानी के निकास वाली चिकनी दोमट भूमि सोयाबीन के लिए अधिक उपयुक्‍त होती है। जहां भी खेत में पानी रूकता हो वहां सोयाबीन ना लें।

कृषि विभाग द्वारा किसानों को खरीफ फसल के संबंध में उपयोगी सलाह दी है। 100 मिमी वर्षा होने पर ही करें सोयाबीन की बोनी
जिसके अनुसार वर्षा के आगमन पश्चात पर्याप्त वर्षा यानी 4 इंच वर्षा होने पर ही सोयाबीन की बुवाई का कार्य करे मध्य जून से जूलाई का प्रथम सप्ताह बुबाई के लिये उपयुक्त है। सोयाबीन की बौवनी हेतु न्यूनतम 70 प्रतिशत अंकुरण के आधार पर उपयुक्त बीज दर का ही उपयोग करें|
सोयाबीन विश्व की तिलहनी एवं ग्रंथिकुल फसल है यह प्रोटीन का महत्वपूर्ण स्त्रोत है इसमें प्रोटीन की मात्रा लगभग 40 प्रतिशत होती हैं वहीँ वसा 20 प्रतिशत तक होता है | भारत देश में सोयाबीन खेती का महत्वपूर्ण योगदान है | भ्बरत में लगभग 4 दशक पूर्व सोयाबीन की व्यावसायिक खेती प्रारंभ हुई थी इसके बाबजूद सोयाबीन ने देश की मुख्य तिलहन फसलों में अपना स्थान हासिल कर लिया | सोयाबीन की खेती मुख्यतः मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, कर्नाटक राजस्थान एवं आंध्रप्रदेश में की जाती है | मध्यप्रदेश के इंदोर शहर में भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान केंद्र की स्थापना की है | जहाँ सोयाबीन को लेकर विभिन्न प्रकार की रिसर्च की जाती है | आइये जानते हैं सोयाबीन की उन्नत खेती के बारे में सभी जानकारी

सोयाबीन की उन्नत किस्में
जे. एस-335 :-

यह सोयाबीन की उन्नत तकनीक है . इस प्रजाति की बीज 95 से 100 दिन में हो जाता है | इस बीज की खासियत यह है की वजन में अच्छी है 10 से 13 दाने का वजन 100 ग्राम होता है | इस बीज की उत्पादन क्षमता 25 – 30 किवंटल / हैक्टेयर होता है | इसका रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक है अन्य बीज से ज्यादा है |
जे.एस. 93-05 :-

इस प्रजाति की बीज का उपज क्षमता 20 से 25 किवंटल प्रति हैक्टेयर है | यह 90 से 95 दिनों में तैयार हो जाता है | इस प्रजाति की बीज का भी वजन 13 बीज का 100 ग्राम होता है | इसकी विशेषताएं अर्द्ध-परिमित वृद्धि किस्म, बैंगनी फूल. कम चटकने वाली फलियां होती है |
एन.आर.सी-86 :-

इसकी विशेषताएं: सफेद फूल, भूरा नाभी एवं रोये, परिमित वृद्धि, गर्डल बीटल और तना-मक्खी के लिये प्रतिरोधी, चारकोल राॅट एवं फली झुलसा के लिये मध्यम प्रतिरोधी है | प्रजाति की बीज का उपज क्षमता 20 से 25 किवंटल प्रति हैक्टेयर है | यह 90 से 95 दिनों में तैयार हो जाता है | इस प्रजाति की बीज का भी वजन 13 बीज का 100 ग्राम होता है |
एन.आर.सी-12 :-

इस प्रजाति की बीज का उपज क्षमता 20 से 25 किवंटल प्रति हैक्टेयर है | यह 90 से 95 दिनों में तैयार हो जाता है | इस प्रजाति की बीज का भी वजन 13 बीज का 100 ग्राम होता है | इसकी विशेषताएं: परिमित वृद्धि, बैंगनी फूल, गर्डल बीटल और तना-मक्खी के लिए सहनषील, पीला मोजैक प्रतिरोधी होता है |
एन.आर.सी-7 :-

इस प्रजाति की बीज का उपज क्षमता 20 से 25 किवंटल प्रति हैक्टेयर है | यह 90 से 95 दिनों में तैयार हो जाता है | इस प्रजाति की बीज का भी वजन 13 बीज का 100 ग्राम होता है | इसकी विषेषताएं: परिमित वृद्धि, फलियां चटकने के लिए प्रतिरोधी, बैंगनी फूल, गर्डल बीडल और तना-मक्खी के लिए सहनशील होती है |
जे. एस. 95-60 :-

इस प्रजाति की बीज का उपज क्षमता 20 से 25 किवंटल प्रति हैक्टेयर है | यह 80 से 85 दिनों में तैयार हो जाता है | इस प्रजाति की बीज का भी वजन 13 बीज का 100 ग्राम होता है | इसकी विषेषताएं: अर्द्ध-बौनी किस्म, ऊचाई 45-50 सेमी, बैंगनी फूल, फलियां नहीं चटकती है |
जे.एस. 20-29 :-

इस प्रजाति की बीज का उपज क्षमता 20 से 25 किवंटल प्रति हैक्टेयर है | यह 90 से 95 दिनों में तैयार हो जाता है | इस प्रजाति की बीज का भी वजन 13 बीज का 100 ग्राम होता है |इसकी विशेषताएं: बैंगनी फूल, पीला दाना, पीला विषाणु रोग, चारकोल राट, बेक्टेरिययल पश्चूल एवं कीट प्रतिरोधी बेक्टेरिययल पश्चूल एवं कीट प्रतिरोधी विशेषताएं: बैंगनी फूल, पीला दाना, पीला विषाणु रोग, चारकोल राट, बेक्टेरिययल पश्चूल एवं कीट प्रतिरोधी बेक्टेरिययल पश्चूल एवं कीट प्रतिरोधी है |

सोयाबीन के बीज

80/85 किलो बीज प्रती हेक्टेयर का उपयोग किया जाए. अंकुरण प्रतिशत 75/80 से कम नही होना चाहिए.

उपचार- बोने से पूर्व प्रति किलोग्राम बीज को थीरम व 1.0 ग्राम बोने से कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण के मिश्रण से शोधित कर लेना चाहिए अथवा कार्बेन्डाजिम 2.0 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से शोधित करना चाहिए. बोने से पहले बीज को सोयाबीन के विशिष्ट राइजोबियम कल्चर से भी उपचारित करें. एक पैकेट 10 कि.ग्रा. बीज के लिये पर्याप्त होता है. एक पैकेट कल्चर को 10 कि.ग्रा. बीज के ऊपर छिड़क कर हल्के हाथ से मिलायें जिससे बी के ऊपर एक हल्की पर्त बन जाये. इस बीज की बुवाई तुरन्त करें. तेज धूप से कल्चर के जीवाणु के मरने की आशंका रहती है, ऐसे खेतों में जहां सोयाबीन पहली बार या काफी समय बाद बोई जा रही हो, कल्चर का प्रयोग अवश्य करें.

सोयाबीन किसान 228 की नई प्रजाति है यह एक कम अवधी में सोयाबीन क़िस्म हैं जो सभी क़िस्मों से अधिक उत्पादकता दूसरों की तुलना में बेहतर है. इस क़िस्म के पौधा 75/80 सेंटीमीटर की ऊँचाई होती है.

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